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श्रद्धा और विश्वास है तो जीवन में सब कुछ मिलता है-  प्रेमभूषण महाराज

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सागर। रामचरित मानस का लाभ प्राप्त करने के लिए मनुष्य के अंदर श्रद्धा भाव सबसे आवश्यक है। मानस जी का प्रारंभ भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के प्रसंग से शुरू होता है। इसके पीछे भी यह सबसे बड़ा कारण है कि भगवान शिव  विश्वास के प्रतीक हैं और माता पार्वती श्रद्धा की प्रतीक हैं। जिस मनुष्य में श्रद्धा और विश्वास का भाव उपस्थित होगा वही रामचरितमानस में गोता लगाकर भगवान का दर्शन प्राप्त कर सकेगा। यह उद्गार सागर स्थित रुद्राक्ष धाम में निर्मित भव्य कथा मंडप में सप्त दिवसीय श्री राम कथा का गायन प्रारम्भ करते हुए पूज्य प्रेमभूषण महाराज ने व्यासपीठ से कथा वाचन करते हुए व्यक्त किए।  

सरस् श्रीराम कथा गायन के लिए लोक ख्याति प्राप्त प्रेममूर्ति पूज्य प्रेमभूषण महाराज ने मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक भूपेन्द्र सिंह के पावन संकल्प से आयोजित सात दिवसीय रामकथा गायन के क्रम में कहा कि श्रद्धा और विश्वास नहीं है तो कुछ भी प्राप्ति नहीं होती है। जैसे संशय स्वरूपा माता सती श्रीराम कथा सुनने गई लेकिन कथा उनके कान में नहीं उतरी।  जिसकी जितनी श्रद्धा दृढ़ है उसको उतनी ही भगवद् फल की प्राप्ति है। श्रद्धा में अर्पण और समर्पण हो तो श्रद्धा अवश्य फल प्रदान करती है।

पूज्यश्री के अनुसार-हम जो करते हैं उस पर हमें ही विश्वास नहीं होता है तो फिर कैसे भगवान का दर्शन होगा। खटपट मिटे तो झटपट दर्शन होगा। लाख कोई समझाए भटकना नहीं है। जो इष्ट हैं उनमें केवट भैया और शबरी मैया की तरह से निष्ठ रहना है। सुग्रीव जी की तरह नहीं बनाना है। भगवान से मिलने के बाद भी संसार में लिपट कर भगवान को ही भूल  गए। महाराज जी ने कहा कि हम जिस युग में जी रहे हैं वहां कोई भी मनुष्य विकारों से दूर नहीं रह पाता है। कामनाओं के मैल मन में तरह-तरह के विकार पैदा करते रहते हैं और इससे मनुष्य का जीवन कष्टमय हो जाता है। अगर हम सहज रहना चाहते हैं, सहज जीना चाहते हैं तो हमारे पास इस कलियुग के मैल को काटने और धोने का एकमात्र साधन है श्री राम कथा। काम, क्रोध, लोभ, मद  और मत्सर आदि विकार कलिमल कहे जाते हैं। इससे बचने का एकमात्र सहज साधन श्री राम कथा ही है। मानस जी में लिखा है इस कथा को जो सुनेगा, कहेगा और गाएगा वह सब प्रकार के सुखों को प्राप्त करते हुए अंत में प्रभु श्री राम के धाम को भी जा सकता है।

पूज्यश्री ने कहा कि जब मन पर कलिमल का प्रभाव हो तो चाह कर भी मनुष्य सत्कर्म के पथ पर आगे नहीं बढ़ पाता है। मनुष्य का मन और उसकी बुद्धि उसके अपने कर्मों के अधीन है। हम जो भी कर्म  करते हैं उसे हमारा क्रियमाण बनता है। यही कर्म फल एकत्र होकर संचित कर्म होता है और फिर कई जन्मों के लिए यह प्रारूप प्रारब्ध के रूप में जीव के साथ जुड़ जाता है। सत्कर्मों से जिसने भी अपने प्रारब्ध को बेहतर बना रखा है, इस जन्म में भी सत्कर्मों में उसी की गति बन पाती है। अन्यथा बार-बार विचार करने के बाद भी हम उस पथ पर अपने को आगे नहीं ले जा पाते हैं।

पूज्य श्री ने कहा कि अगर हमारे घर में जीवित माता-पिता हैं तो वही हमारे भगवान हैं। माता-पिता की सेवा करके हम वह सब प्राप्त कर सकते हैं जो हम भगवान से चाहते हैं। श्री रामचरितमानस में यह बताया गया है की माता-पिता की आज्ञा मानने वाले, गुरु और अपने से बड़ों की आज्ञा मानने वाले सदा ही सुखी रहते हैं। उन्होंने बताया कि धरती पर तीन प्रकार के लोग होते हैं। एक तो अपने प्रारब्ध के कारण सब कुछ जानने के कारण उचित कार्य ही करते हैं, दूसरे वह है जो दूसरों के अच्छे कार्य को देखकर समझ के कार्य करते हैं। और तीसरे वह हैं जो गलत करते हैं भुगतते हैं और तब उससे सीखते हैं। हमें तीसरा मार्ग अपनाने से बचना चाहिए। महाराज जी ने कहा कि  सत्य मार्ग पर चलकर धन अर्जित करने वाले लोग ही शाश्वत सुख की प्राप्ति कर पाते हैं। छल प्रपंच से धर्म तो अर्जित किया जा सकता है लेकिन उसे सुख की प्राप्ति कदापि संभव नहीं है। अधर्म के पथ पर चलकर धन अर्जित करने वाले जीवन में कभी भी सुखी नहीं हो सकते हैं।  दूसरों को वह दूर से सुखी तो दिखते हैं लेकिन वास्तव में वह सुखी होते नहीं है अगर उनके हृदय का हाल जाना जाए तो पता चलता है कि उनके दुख की कोई सीमा नहीं है।
पूज्यश्री ने बताया कि मनुष्य के जीवन में पूजा पाठ भजन क्यों आवश्यक है? आपने कहा कि जब मनुष्य धर्म कार्यों में पूजा पाठ में संलग्न हो जाता है तो उसके जीवन से भय, विशेषतः मृत्यु का भय बिल्कुल समाप्त हो जाता है क्योंकि तब वह धीरे-धीरे ईश्वर के निकट पहुंचने लगता है। जो व्यक्ति भगवान से संबंध स्थापित कर लेता है तो फिर उसे इस संसार की किसी भी चीज से दुख नहीं पहुंचता। इसीलिए कहा गया है कि जो संत हैं वह दुख या सुख की स्थिति में सम भाव में ही रहते हैं किसी भी परिस्थिति में उनकी मन की स्थिति नहीं बदलती है। भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के प्रसंग की चर्चा करते हुए पूज्य महाराज श्री ने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति में विवाह एक मर्यादा महोत्सव है। भगवान को केवल और केवल प्रेम ही प्यारा है बार-बार मानस जी में इसकी चर्चा आई है। यह जरूरी नहीं है कि भगवान भी हम से प्रेम करें हमें भगवान से अवश्य प्रेम करना चाहिए अगर हम भगवान से प्रेम की अपेक्षा करते हैं तो यह व्यापार हो जाएगा, लेनदेन का व्यापार। भगवान से बदले में कुछ चाहना तो व्यापार ही है।उन्होंने कहा कि कल रुद्राक्ष धाम मंदिर में दक्षिणमुखी हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाएगी और स्वयं हनुमान जी कथा श्रवण के लिए प्रांगण में विराजमान रहेंगे।

श्रीराम कथा से भारतीय संस्कृति की आत्मा है-पूर्व गृहमंत्री  भूपेन्द्र सिंह

श्रीराम कथा के प्रारंभ में अपनी बात रखते हुए पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि जब तक भारत में रामकथा जीवित है, तब तक भारतीय संस्कृति सुरक्षित है। कथा सुनने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है, क्योंकि जहां-जहां रामकथा होती है, हनुमान जी वहां अदृश्य रूप से उपस्थित रहते हैं। श्रीरामकथा भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो पीढ़ियों को जोड़ती है, ‘राष्ट्र चरित्र‘ का आधार है। उन्होंने कहा कि अगर भगवान राम तक पहुंचना है, तो हनुमान जी का पल्ला पकड़ लो। हनुमान जी राम जी के द्वारपाल हैं (‘‘राम दुआरे तुम रखवारे‘‘) उनकी कृपा के बिना राम नहीं मिलते। श्रीराम भारत के आदर्श हैं। वे सत्य के अवतार हैं। सीता भारत की स्त्रियों के लिए धैर्य और पवित्रता का आदर्श हैं। जिस दिन भारत श्री राम और माता सीता के आदर्शों को भूल जाएगा, उस दिन भारत की आत्मा मर जाएगी।‘‘ पूर्व गृहमंत्री श्री भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि प्रभु श्री राम के बिना भारत की कल्पना करना असंभव है। वे हमारे राष्ट्र-पुरुष हैं। अयोध्या में बना श्री राम मंदिर केवल एक देव मंदिर नहीं, बल्कि ‘राष्ट्र मंदिर‘ है। यह भारत की सांस्कृतिक विजय और स्वाभिमान का सूर्योदय है। हनुमान जी रामकथा के प्राण हैं, बिना उनके कथा अधूरी है। हनुमान जी युवाओं के आदर्श हैं बल, ब्रह्मचर्य, अनुशासन और सेवा का ऐसा संगम कहीं और नहीं मिलता।

महाराज श्री ने कई सुमधुर भजनों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। बड़ी संख्या में उपस्थित रामकथा के प्रेमी, भजनों का आनन्द लेते हुए झूमते नजर आए। मुख्य यजमान पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह तथा उनके परिवार के सदस्यों ने व्यास पीठ का पूजन किया और भगवान की आरती उतारी। तत्पश्चात पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह, पूर्व सांसद राजबहादुर सिंह,महापौर श्रीमती संगीता तिवारी, पूर्व मंत्री नारायण कबीर पंथी, एड कृष्णवीर सिंह, प्रभु दयाल पटेल, डॉ. सुशील तिवारी, पूर्व महापौर मनोरमा गौर,अनुराग प्यासी, रिटा. डीएसपी वीरेन्द्र बहादुर सिंह, जिला क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष लखन सिंह ने पं प्रेमभूषण जी महाराज का अभिनंदन किया।


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